रिश्ते बदलने हैं तो पहले अपनी सोच बदलें | Want to Improve Relationships?

Want to Improve Relationships? Change Your Thinking First

 

Want to Improve Relationships?

 आज रिश्ते इतने नाजूक हो गए हैं कि एक गलत शब्द और सबकुछ बिखर जाता है। 30-40 साल पहले कितना डिवोर्स था भारत के अंदर। एक तो पहले होता ही नहीं था और अगर होता भी था तो कोई किसी को बताता नहीं था। क्योंकि वो स्टिगमा था। आजकल लोग अपने सोशल मीडिया पर डालते हैं हमलोग अलग-अलग हो गए। ये भारत की संस्कृति नहीं है। ये सब चीजें पिछले 30 साल के अंदर हुई है। और इसलिए उनको बदलना बहुत असान है। तो हम क्या बोल रहे हैं रिश्ते में, क्या हम व्यवहार कर रहे हैं, सिर्फ उससे रिश्ता नहीं बनता। मैं आपके बारे में कैसा सोच रही हूं उससे रिश्ता बनता है। मतलब अभी-अभी इनसे मिले, इनके बारे में सोच कुछ और रहे हैं और बोल कुछ और रहे हैं। 

हमें अवेयरनेस नहीं है कि हम वो करते हैं। अभी-अभी किसी को मिले कहा आपसे मिलके बहुत मजा आया। हम अगले हफ्ते फिर मिलेंगे। आप जरूर घर आना। और अंदर से बोलते हैं कितना बोर किया मेरा घंटा वेस्ट हो गया। अब सामने वाले को इतने प्यार से बुलाया था। वो अगले हफ्ते आ जाएंगे घर हमारे। फिर हम अंदर से सोचेंगे ले इनको एक बार बोला आ जाओ, वो आ भी गए अपने आप ऐसे। फिर हम उपर से उनको खुश करने के लिए बोलते हैं खाना खाकर जरूर जाना। इतने प्यार से बोलते हैं वो उठने लगे थे, बैठ ही जाते हैं फिर से। हम बोलते हैं एक ही बार बोला ये बैठ ही गया खाना खाने के लिए। ये है सोचना कुछ और बोलना कुछ और। 

ये अंदर की सच्चाई-सफाई जब तक नहीं होगी, हमारी शक्ति नहीं बढ़ेगी। अगर कोई बात बोलने लायक नहीं है तो फिर वो सोचने लायक भी नहीं है। अगर आप दूसरे को बोल नहीं सकते क्योंकि उससे उसको तकलीफ होगी। तो सोचना भी वैसा नहीं है क्योंकि उससे मुझे तकलीफ होगी। जब दो एनर्जा दूसरे को जाएगी सोच कुछ और, और बोल कुछ और तो रिश्ता कभी मजबूत नहीं बन सकता है। अगर हरेक आज अपने रिश्तों को चेक कर लें। अगर आप अपने किसी भी रिश्ते को और सुंदर और शक्तिशाली बनाना चाहते हैं। उसके लिए बैठकर बात करने की जरूरत नहीं होती। 

कई बार हम कहते हैं ना बैठो-बैठो बात करते हैं, क्या प्रॉब्लम है। जैसे ही बैठते हैं बात करने के लिए इतनी बातें बाहर निकलकर आती है कि वो गांठें खुलने की बजाए कई बार और भी जयादा गांठे बन जाती है। फिर हम कहते हैं आप मेरे बारे में ऐसा भी सोचते हो। बैठकर बात करने की जरूरत नहीं होती है। मन से दोनों में से एक जना अपनी सोच को बदल लें उनके लिए। आपके रिश्ते की सारी गांठे खुल जाएंगी। क्योंकि रिश्ता मन से बनता है। 

आप उनके लिए जो हैं जैसे हैं वैसा नहीं सोचना। जैसा आप चाहते हैं कि वो हो वैसा संकल्प उनके लिए करना। तो आपका संकल्प उनकी भी सृष्टि को बदल देगा। क्योंकि संकल्प से सृष्टि बनती है। वो अभी हम देखेंगे कैसे करना है। तो रिश्ते मन से बन रहे हैं। शरीर का स्वास्थ्य कहां बनता है - मन से बनता है। मन की स्थिति कहां बनती है आत्मा से बनती है। मेरा काम - कारोबार तो वैसे ही मन से चलता है। और सबसे इम्पॉरटेंट चीज इस साल हमने प्रकृति में बहुत उथल-पुथल देखा, पानी ने बहुत उथल-पुथल किया है। क्यों प्रकृति ऐसा कर रही है, क्या कारण है। 

प्रकृति और मनुष्य आत्मा का रिश्ता तो बहुत अच्छा होना चाहिए। प्रकृति साथ देती है, सहयोग देती है मनुष्यात्मा को। लेकिन अगर आत्मा की शक्ति घट जाती है तो प्रकृति पर उसका बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।

बीके शिवानी बहन

अंतरराष्ट्रीय मोटिवेशनल वक्ता, ब्रह्माकुमारीज



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