राजस्थान सरकार और ब्रह्माकुमारीज के
बीच कृषि विकास के लिए एमओयू, प्राकृतिक खेती को मिलेगा प्रोत्साहन
आबू रोड, राजस्थान। किसानों के सशक्तिकरण, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और ग्रामीण समुदायों के समग्र विकास की दिशा में राजस्थान सरकार के कृषि विभाग एवं ब्रह्माकुमारी संस्था के राजयोग एज्युकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन के कृषि एवं ग्रामीण विकास प्रभाग, माउंट आबू के बीच 25/10/2026 को एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। ब्रह्माकुमारीज की स्थापना के 90 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित वैश्विक शिखर सम्मेलन के दौरान हुए इस समझौते का उद्देश्य कृषि एवं ग्रामीण विकास के क्षेत्र में आपसी सहयोग को मजबूत करना है।
प्राकृतिक एवं टिकाऊ खेती को मिलेगा बढ़ावा
इस समझौते के माध्यम से किसानों और
ग्रामीण समुदायों के कल्याण के लिए संयुक्त रूप से कार्य करने, कृषि के प्रति
सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने तथा सतत एवं प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को
प्रोत्साहित करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। साथ ही, कृषि क्षेत्र में जागरूकता
बढ़ाने और ग्रामीण विकास से जुड़ी गतिविधियों को गति देने के लिए सहयोग की
संभावनाओं को आगे बढ़ाया जाएगा।
रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करना समय की जरूरत : नरेश
गोयल
राजस्थान सरकार के कृषि विभाग के
आयुक्त नरेश गोयल ने कहा कि इस पहल में कृषि विभाग के 10 हजार से अधिक कर्मचारी
जुड़कर कार्य करेंगे। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जैविक एवं प्राकृतिक खेती
को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी
की गुणवत्ता और उर्वरा शक्ति पर पड़ने वाले प्रभावों के प्रति जागरूक होना जरूरी
है।
उन्होंने कहा कि हम धरती को माता
मानते हैं, लेकिन अनजाने में उसी धरती में रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग
करते हैं। खेतों में इस्तेमाल होने वाले रसायनों का प्रभाव खाद्य पदार्थों के
माध्यम से मानव जीवन तक पहुंच सकता है। इसलिए खेती की ऐसी पद्धतियों को
प्रोत्साहित करना आवश्यक है, जो मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और पर्यावरण संरक्षण
में सहायक हों।
अनुदान के कारण उर्वरकों के अधिक उपयोग की प्रवृत्ति पर ध्यान
जरूरी
नरेश गोयल ने रासायनिक उर्वरकों पर
सरकारी अनुदान का उल्लेख करते हुए कहा कि किसानों को यूरिया कम कीमत पर उपलब्ध
कराया जाता है, जबकि इसकी वास्तविक लागत का बड़ा हिस्सा सरकार वहन करती है।
उन्होंने कहा कि किसानों में उर्वरकों के अधिक उपयोग की प्रवृत्ति को समझना और
संतुलित उपयोग के प्रति जागरूकता बढ़ाना जरूरी है।
यूरिया-DAP धरती के लिए जहर है
गोयल ने बताया कि ना चाहते हुए भी हमें
बड़ी मात्रा में रासायनिक उर्वरक किसानों को उपलब्ध कराना पड़ता है। हम लगभग 20 लाख
टन यूरिया और 6-7 लाख टन डीएपी हर साल प्रयोग करते हैं। यह रसायन खेत से अन्न के रूप
में हमारे शरीर में जाता है। आज हर गली-मोहल्ले में कैंसर के पेशेंट बढ़ रहे हैं।
उन्होंने ब्रह्माकुमारीज के तपोवन में देखी गई मल्टीलेयर फार्मिंग का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसी कृषि पद्धतियों से भी लोगों को प्रेरणा लेनी चाहिए।
किसानों के सशक्तिकरण के साथ संस्कारों का शुद्धिकरण भी
उद्देश्य : राजयोगिनी सरला दीदी
ब्रह्माकुमारीज के कृषि एवं ग्रामीण
विकास प्रभाग की अध्यक्षा राजयोगिनी सरला दीदी ने कहा कि प्रभाग पिछले 30 वर्षों
से समाज और देश की सेवा में सक्रिय है। प्रभाग का विशेष लक्ष्य शाश्वत यौगिक खेती
के माध्यम से किसानों का सशक्तिकरण करना, उनके संस्कारों का शुद्धिकरण करना तथा
प्राचीन भारतीय कृषि पद्धतियों को पुनः स्थापित करने की दिशा में कार्य करना है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में
विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों का सहयोग मिल रहा है, जिसके परिणामस्वरूप कई
विश्वविद्यालयों में शोध संबंधी गतिविधियां भी संचालित हो रही हैं। उन्होंने
विश्वास व्यक्त किया कि राजस्थान सरकार के कृषि विभाग के साथ यह समझौता प्राकृतिक
एवं यौगिक खेती के विस्तार, किसानों के कल्याण और ग्रामीण विकास के प्रयासों को नई
गति प्रदान करेगा।
कृषि एवं ग्रामीण विकास के लिए साझा प्रयास
इस अवसर पर जोधपुर कृषि विश्वविद्यालय
के कुलपति डॉ. वी.एस. जैतावत, एसडी कृषि विश्वविद्यालय, दांतीवाड़ा के कुलपति डॉ.
राजेश्वर सिंह चंदेल, कृषि एवं ग्रामीण विकास प्रभाग के उपाध्यक्ष राजयोगी बीके
राजू भाई, ब्रह्माकुमारीज की संयुक्त मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी संतोष दीदी तथा
संस्था के मैनेजमेंट बोर्ड की सदस्या राजयोगिनी सुषमा दीदी सहित अन्य वरिष्ठ भाई-बहनें
उपस्थित रहे।
यह समझौता किसानों के हितों को प्रोत्साहित करने, प्राकृतिक एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने तथा ग्रामीण समुदायों के समग्र विकास के लिए सरकारी विभाग और आध्यात्मिक संस्था के संयुक्त प्रयासों का एक महत्वपूर्ण कदम है। आशा है कि इस सहयोग से कृषि क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव लाने और किसानों को अधिक टिकाऊ खेती की दिशा में प्रेरित करने के नए अवसर विकसित होंगे।
